Sunday, July 23, 2017

इस क्षण में ही मिल सकता वह

२४ जुलाई २०१७ 
केवल वर्तमान का यह नन्हा सा पल ही सत्य है. यही क्षण अपने भीतर अनंत को छुपाये है. जैसे एक परमाणु में असीम शक्ति छिपी है वैसे ही एक क्षण में अनंत समय छिपा है. वर्तमान में रहने की कला ही ध्यान है. यदि कोई इस कला को सीख लेता है तो वह कभी समय की कमी महसूस नहीं करता. वास्तव में वर्तमान के सिवा कोई समय ही नहीं है, सब कुछ इसी क्षण में है और इसी वक्त है. अनंत काल जो बीत गया और अनंत काल जो आने वाला है, वह इसी क्षण में है अन्यथा नहीं है. जो आज अतीत बन गया है, वह तो अभी है नहीं, जो भावी है वह भी अभी नहीं है. धर्म का अनुभव वर्तमान में ही हो सकता है. 

Saturday, July 22, 2017

निज स्वभाव है सदा एक रस

२३ जुलाई २०१७ 
संत, शास्त्र और हमारे जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि धर्म ही हमें थामता है. धर्म जो हमारा स्वभाव है, वही ताओ है, वही नियम है, वही ऋत है और वही जानने योग्य है. हम इस जीवन में अनेक लोगों से मिलते हैं पर खुद से मिलना मृत्यु तक टालते रहते हैं. हम जगत को महत्व देते हैं पर जो इस जगत को देखता है, उस आत्मा को अनदेखा ही रहने देते हैं. द्रष्टा दृश्य से बड़ा है या छोटा ? छोटी सी आँख में इतना बड़ा आकाश समाने की शक्ति है, छोटे से मन में सारा ब्रह्मांड समा जाता है. कितनी अपार शक्ति है हमारे भीतर. अनेक जन्मों के अनंत संस्कार मन पर अंकित हैं. स्वयं को पहचान कर ही हम सदा अडोल रह सकते हैं.

Friday, July 21, 2017

पूर्ण पूर्ण से ही उपजा है

२१ जुलाई २०१७
जीवन में होने वाला हर अनुभव हमें पूर्णता की ओर ले जाने के लिए है. हर आत्मा अपने भीतर सत्य की सम्भावना लिए हुई जन्मती है. सत्य की झलक उसे मिल भी सकती है और अंधकार में खो भी सकती है. सबसे पहला सत्य है हमारा स्वयं का अस्तित्त्व. मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार के रूप में अंतःकरण. मन की शक्ति अपार है, जिसका सही-सही ज्ञान होने पर हम इसका सदुपयोग करना सीख जाते हैं. मन के संस्कारों को शुद्ध करते हुए हम उसे उसके मूल तक ले जाते हैं, जहाँ से उसे पोषण मिलता है और वह उस तृप्ति का अनुभव करता है जिसकी उसे तलाश है. 

Thursday, July 20, 2017

तू प्रेम का सागर है

२० जुलाई २०१७ 
परमात्मा को हटा दें तो इस जगत में बचता ही क्या है ? उसका ऐश्वर्य, उसकी विभूतियाँ और उसका अनंत साम्राज्य ही चारों ओर फैला है. मानव चाहे तो उसका भागीदार बन सकता है अन्यथा मात्र पहरेदार ही रह सकता है. अपना जान के उसे पुकारे अथवा तो उसे भुलाकर सुख-दुःख के झूले में ही झूलता रहे. प्रेम को हटा दें तो भी कुछ नहीं बचता, अपनापन, आत्मीयता और दुलार यदि जीवन में न हों तो मरुथल बन जाता है जीवन. मानव चाहे तो अपना अहंकार खो कर उनमें डूब सकता है अन्यथा संबंधों में भी व्यापार ही चलता है.  

Wednesday, July 19, 2017

जिसने जाना राज अनोखा

१९ जुलाई २०१७ 
संत जन सदा ही कहते हैं, मानव देह दुर्लभ है. वाणी भी इसी देह में सम्भव है. अनुभव करने की शक्ति, स्वयं को जानने की शक्ति, जीने की शक्ति, सोचने की शक्ति इसी में मिलती है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इसी देह में प्राप्त होते हैं. इसी में रहकर परम का अनुभव किया जा सकता है. किसी अन्य के लिए परम का अनुभव नहीं करना है, परम के लिए भी नहीं, स्वयं के लिए. स्वयं का सही का आकलन करने के लिए ही उसका अनुभव करना है. हम उसी असीम सत्ता का अंश हैं, उसकी शक्ति हममें भी है, उस का अनुभव हम कर सकते हैं, यह देह इसी काम के लिए मिली है. वाणी का वरदान जो हमें मिला है, अब वह वाणी किसी को दुःख न दे, पूर्णता को प्राप्त हो. बुद्धि जो सदा छोटे दायरे में सोचती रही है, अब उस परम को ही भजे. हम पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ने को ही जीवन कहे चले जाते हैं. इतना सुंदर जीवन केवल मृत्यु की प्रतीक्षा ही तो नहीं हो सकता, अवश्य ही इसके पीछे कोई राज है, और जिसका पता केवल परम ही बता सकता है.  

Tuesday, July 18, 2017

राम रतन धन पायो

१८ जुलाई २०१७ 
संत कहते हैं, जिसकी हमें तलाश है वह मिला ही हुआ है. वे कहते हैं, यकीन कर लें और अपनी जेबें जरा टटोलें, हीरा पड़ा है.. जो इस बात पर यकीन करके खोजेगा सचमुच हीरा मिल जाएगा. मिलते ही जोर से हँसी आती है तब. खुद को ही खोजते-फिरते रहे थे, खुद को ही मिल नहीं पाते. जिनकी नजरें सदा बाहर लगी हैं भीतर कभी झांक ही नहीं पाते. एक दिन जब उसकी खबर हो जाएगी जो भीतर छिपा है तब एक ऐसा फूल खिलेगा, जो कभी नहीं मुरझाता. ऐसा नहीं होता तो कोई दिल भक्ति के गीत नहीं गाता.


Sunday, July 16, 2017

नित नूतन जब जग लगता है

१७ जुलाई २०१७ 
हम जो भी करते हैं, सोचते हैं या कहते हैं, वह निन्यानवे प्रतिशत बासी होता है. हम पुराने को ही दोहराते रहते हैं. सुबह अलार्म सुनकर बिस्तर छोड़ते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. अभ्यास वश ही पैर चप्पल तलाशते हैं, फिर अभ्यास वश ही ब्रश आदि, देह को जिन कामों का अभ्यास हो गया है, वह मशीन की तरह करता जाती है. फिर कोई विचार उड़ता हुआ सा मन में आ जाता है, उसके प्रति प्रतिक्रिया भी पूर्व के अनुसार ही होती है. हमारे इर्द-गिर्द जो कुछ भी होता है वह भी तो दोहराता है स्वयं को. एक चक्र की भांति हम उसमें ऊपर-नीचे होते रहते हैं, कहीं पहुँचते नहीं. कुछ नया हो तभी मानव बुद्धि की सार्थकता है. प्रतिदिन या फिर प्रतिपल नया होने के लिए प्रकृति को क्या कुछ विशेष करना पड़ता है, इतना ही तो कि परिवर्तन का वह प्रतिरोध नहीं करती. जीवन को जिस रूप में वह आता है सहज स्वीकारने से नयापन बना ही रहता है. जब कोई पूर्वाग्रह, पूर्व मान्यता न हो, अपनी या दूसरों की विशेष इमेज के प्रति कोई राग न हो तब हर पल कुछ नया भी होगा तो वह सहज स्वीकार्य होगा.