Sunday, May 20, 2018

सुख-दुःख के जो पार हो गया


२१ मई २०१८ 
संत कहते हैं, जीवन में शुभ और अशुभ दोनों हैं, रात और दिन की तरह सुख और दुःख की तरह विपरीत सदा साथ-साथ चलते हैं. सच्चा साधक वही है जो दोनों को देखता है, और दोनों से ही प्रभावित नहीं होता. उसे तो वहाँ पहुंचना है जहाँ दो नहीं हैं, अद्वैत ही उसकी मंजिल है. पोखर में जल भी है और कीचड़ भी, कमल दोनों से ऊपर है, अछूता ! यदि सुख की तृष्णा बनी रही तो दुःख की राह सामने ही खड़ी है. यदि अच्छा ही अच्छा चाहा तो बुरा कोई न कोई रूप धरकर डराएगा ही. जीवन जैसा भी दिखाए साक्षी भाव से देखने की कला ही अध्यात्म है. देह जब तक है जरा और मृत्यु का भय बना ही है, प्राण जब तक हैं, भूख-प्यास लगते ही रहेंगे. मन जब तक है, शोक-मोह से छुटकारा नहीं. स्वयं आत्मा में स्थित होकर इन तीनों को देखना है, जहाँ एकरस शांति के अलावा कुछ भी नहीं. देह, प्राण, मन तभी तो हैं जब आत्मा स्वयं है, वही उनका आधार है. जिसने इस रहस्य को समझ लिया वह सदा के लिए मुक्त है.  

Friday, May 18, 2018

जब तक न एकत्व सधेगा


१९ मई २०१८ 
जीव, जगत और ईश्वर, जब तक ये तीन दिखते हैं, समाधान नहीं मिलता. मन में कोई न कोई भेद बना ही रहता है. जीव जब ईश्वर के तन्मयता का अनुभव कर लेता है, जगत से भी कोई दूरी नहीं रह जाती. किसी के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं रहती, स्वयं को कुछ विशेष दिखाने की दौड़ समाप्त हो जाती है. अपने सुख के लिए किसी बाहरी साधन पर ही निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती. कर्त्तव्य कर्म करने के लिए ऊर्जा और उत्साह सदा ही बना रहता है.



Thursday, May 17, 2018

जीवन जैसे भोर का तारा


१८ मई २०१८ 
‘जीवन प्रतिपल बदल रहा है, इस जगत में सब कुछ अनित्य है, जीवन क्षण भंगुर है, यहाँ सब कुछ अस्थायी है, यह जीवन एक सराय की तरह है, इसमें सदा नहीं रहना है, एक पुल की तरह है, जिसे पार करना है और निकल जाना है, पुलों पर कोई घर नहीं बनाता’. ये सभी वाक्य अथवा इनमें से कोई न कोई वाक्य हमने सुने हैं, सुनते ही रहते हैं. इन वाक्यों का शाब्दिक अर्थ भले ही हमने समझ लिया हो पर अनुभवगत अर्थ अभी तक नहीं समझा है. देह को नित्य ही बदलते हुए हम देखते हैं, कहाँ बचपन की सुकोमल देह, युवावस्था की सुदृढ़ देह और फिर वृद्धावस्था की अशक्त देह. सुबह से शाम तक मन भी बदलता है, समय के साथ भावनाएं बदलती हैं. स्थिर लगने वाले पर्वत भी बदलते हैं. धरती भी करवट लेती है, सूर्य के ताप में भी अंतर आता है. इस जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो निरंतर बदल न रही हो. इस सारे बदलाव के पीछे एक अबदल है जो कभी नहीं बदलता, किसी वृद्ध को सभी ने कभी न कभी कहते सुना है, मुझे नहीं लगता मैं बूढ़ा हो गया हूँ, किसी को भी अपने वृद्ध होने का अहसास भीतर से नहीं होता, देह को देखकर अथवा आस-पास के बच्चों को बड़ा हुआ देखकर ही उसे लगता है, वह अब युवा नहीं है. हरेक के भीतर एक ऐसी सत्ता है जो कभी नहीं बदलती, उसे ही आत्मा कहते हैं. परिवर्तनशील जगत के पीछे भी एक ऐसी सत्ता है जो सदा एक सी है. उसे ही परमात्मा कहते हैं. ध्यान में ही उसका अनुभव किया जा सकता है. उसमें टिककर इस बदलने वाले संसार से अछूता रहा जा सकता है, इसे ही जलकमलवतजीवन कहते हैं. यही एक साधक का लक्ष्य है, सम्भवतः यही हर जागरूक मानव का भी लक्ष्य है.

Wednesday, May 16, 2018

अंतर में जब बोध जगेगा


१७ मई २०१८ 
बुद्धिगत ज्ञान हमें कहीं पहुंचाता नहीं है, एक ही चक्र में उलझाये रखता है. आजकल प्रतिदिन सुबह व्हाट्सएप पर कितनी सुंदर ज्ञान की बातें पढ़ने को मिलती हैं. एक पल के लिए हृदय में कुछ शुभ अनुभूति होती है और जुगनू की चमक की तरह अगले ही पल खो जाती है. समाचारपत्र में या फेसबुक पर भी हम सुंदर संदेश पढ़ते हैं पर कुछ मिनटों में ही मन उसे भुला देता है. शास्त्र कहते हैं,  सुनना या पढ़ना अति आवश्यक है पर उससे भी अधिक आवश्यक है, पढ़े हुए पर चिंतन करना, और सबसे अधिक आवश्यक है उसे वास्तविक जीवन में उपयोग में लाने का प्रयत्न. उदाहरण के लिए आज सुबह ही एक संदेश मिला, जीवन आश्चर्य और विस्मय से भरा है, देखने की नजर चाहिए. पढ़कर अच्छा लगा, सोचा, संसार में इतने दुखों के बावजूद, इतनी जनसंख्या के बावजूद हर नया शिशु अपने भीतर वही उल्लास और प्रेम लिए जन्मता है, माँ-पिता के लिए वह किसी राजकुमार या राजकुमारी से कम नहीं होता. बाहर किसी बच्चे के रोने की आवाज आयी तो उसे जाकर चुप कराया और कुछ खाने को दिया. आँसुओं के मध्य उसकी मुस्कान किसी आश्चर्य से कम नहीं थी. बाहर फूलों पर तितलियाँ थीं और पेड़ों पर पंछी, जिन्हें किसी चुनाव के परिणाम और किसी तूफान का भय नहीं था. समझ में आया, जीवन हर पल अपनी पूरी भव्यता के साथ प्रकट हो ही रहा है, बस देखने की नजर चाहिए.

Tuesday, May 15, 2018

स्वयं जो जाने सो ही जाने


१६ मई २०१८ 
संत और शास्त्र हमें ‘स्वयं’ को जानने के लिए कहते हैं, जिसे ‘स्वयं’ के द्वारा ही जाना जा सकता है. जानने का साधन है बुद्धि, यदि बुद्धि स्थिर होगी, शुद्ध होगी अर्थात राग-द्वेष से रंगी हुई नहीं होगी, तभी वह भीतर जाकर ‘स्वयं’ को यानि आत्मा को दिखा सकती है. मन के द्वारा हम जगत का ज्ञान प्राप्त करते हैं. मन ही इन्द्रियों से जुड़ा है, रंग, रूप, स्वाद, गंध और स्पर्श का ज्ञान हमें मन के द्वारा होता है, बुद्धि इन्हें अच्छा या बुरा कहकर स्वीकारती या नकारती है और बुद्धि के पीछे स्थित चेतन आत्मा इसे जानता है. मन व बुद्धि जड़ हैं, दोनों चेतन आत्मा के लिए हैं. वह उनका स्वामी है और प्रेम, शांति व आनंद उसका स्वभाव है. मन, बुद्धि प्रकृति से बने हैं और आत्मा परमात्मा का अंश है. मन व बुद्धि के साथ यदि आत्मा का संबंध न हो तो वे कुछ नहीं जान पायेंगे. जैसे चन्द्रमा को यदि सूर्य का प्रकाश न मिले तो वह जरा भी प्रकाश नहीं दे पायेगा. यदि हम स्वयं को आत्मा रूप में अर्थात ज्ञाता, द्रष्टा रूप में मन, बुद्धि से पृथक जान लेते हैं तो सदा एकरस शांति का अनुभव सहज ही कर सकते हैं.  

Sunday, May 13, 2018

कर्मशील हो जीवन अपना


१४ मई २०१८ 
सृष्टि में हर पल कुछ न कुछ घट रहा है, लगता है जगत नियंता एक पल भी विश्राम नहीं करता. भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, मुझे कुछ भी पाने अथवा करने योग्य नहीं है फिर भी मैं अनवरत क्रियाशील हूँ. पंछी भी दिन भर कुछ न कुछ करते ही रहते हैं, और तभी वह रात होते ही चैन की नींद सो जाते हैं. मानव ने जो अपनी रातों की नींद गंवा दी है क्या वह शारीरिक अकर्मण्यता के कारण तो नहीं है, आजकल परिवार छोटे हो गये हैं, सुख-सुविधा और साधन सम्पन्न परिवारों में काम करने के लिए भी कोई न कोई सहायक या सहायिका होती ही है. शेष बचा काम आधुनिक उपकरणों से हो जाता है, अब ज्यादा समय बीतता है टीवी, कम्प्यूटर के सामने या मोबाइल पर, देह को अति विश्राम मिलने से वह स्थूल हो जाती है और फिर अस्वस्थ. शारीरिक थकान नहीं हुई तो निद्रा दूर ही रहेगी. निद्रा में थका हुआ तन ही तो विश्राम पाता है. मन तो तब भी सक्रिय रहता है. देह की स्थिरता ही मन को भी एकाग्र करने में सहायक होती है और तभी समाधि जैसी गहन निद्रा का अनुभव कोई कर सकता है, जैसे शिशु सोते हैं या कोई थका हुआ कृषक या मजदूर. घर के कामों में मशीनों के बढ़ते चलन की वजह से हाथ-पैर के जोड़ों में गति नहीं होती और यदि कोई नियमित व्यायाम न करे तो उनमें पीड़ा होने लगती है. इससे बचने का उपाय है कि प्रतिदिन कुछ न कुछ शारीरिक श्रम किया जाये. कुछ खेती करें, गमलों में ही सब्जियां उगायें. मोहल्ले में जाकर सबको साथ लेकर योग की कक्षा चलायें या स्वच्छता का बीड़ा उठायें. समाज को आगे ले जाने का बीड़ा श्रमशील व्यक्तियों ने ही उठाया है. जीवन की अंतिम श्वास तक जो सक्रिय रह सकेगा वही मृत्यु का स्वागत हँसते-हँसते कर सकता है.  

गुरू माता-पिता, गुरू बंधु सखा


१३ मई २०१८ 
आज मातृ दिवस है और साथ ही भारत के एक महान संत श्री श्री रविशंकर जी का जन्मदिन भी, संयोग से इस वर्ष ये दोनों उत्सव एक साथ मनाये जा रहे हैं. किसी भी व्यक्ति के जीवन में माँ और गुरू दोनों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता. कहते हैं भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकते इसलिए उन्होंने माँ की रचना की, अर्थात माँ भगवान का ही एक रूप है. वह ब्रह्मा की तरह संतति का सृजन करती है, विष्णु की तरह पालना करती है और शिव की तरह बालक की कमियों का विनाश भी करती है. शिशु का मन कोरी स्लेट की तरह होता है, माँ के पोषण में उसे केवल आहार ही नहीं मिलता, मिलती है एक पूरी परंपरा, संस्कारों की एक श्रंखला. जितने धैर्य और प्रेम से एक माँ अपने शिशु का पालन करती है, उतना ही प्रभावशाली उसका व्यक्तित्त्व बनता है. गुरू भी माँ की तरह होता है, प्रेमपूर्ण और बिना किसी प्रत्याशा के अपने स्नेह लुटाने वाला. गुरु को भी ब्रह्मा, विष्णु, महेश का रूप कहा जाता है. वह शिष्य को द्विज बनाता है अर्थात उसका दूसरा जन्म गुरू के द्वारा होता है. शिष्य के मन के विकारों को दूर करने का उपाय बताकर गुरू उसे आत्मज्ञान प्रदान करता है. स्वयं का ज्ञान पाकर ही वह बन्धनों से स्वयं को मुक्त करता है और परमात्मा के आनंद का अनुभव करता है.