Friday, September 22, 2017

मन, वाणी के पार हुआ जो

२३ सितम्बर २०१७ 
जीवन कितना अबूझ है और कितना सरल भी. हरियाली का आंचल ओढ़े माँ के समान पोषण करती यह धरती, जिसका अन्न और जल पाकर हमारा तन बनता है. पिता के समान प्राण भरता आकाश जिससे यह काया गतिशील होती है. अन्न और प्राण के संतुलन का नाम ही तो जीवन का आरम्भ है. इसके बाद वह पुष्पित और पल्लवित होता है शब्दों और विचारों में, वाणी का अद्भुत वरदान मानव जीवन को विशिष्ट बनाता है. वाणी के भी पार है वह परम तत्व जिसे जानकर जीव पूर्णता का अनुभव करता है. साधक पहले तन को साधता है, फिर मन को, पश्चात वाणी को, जिसके बाद चेतना स्वयं में ठहर जाती है. स्वयं के पार जाकर ही परम चैतन्य का अनुभव होता है.  


Thursday, September 21, 2017

शक्ति का संधान करें जब

२२ सितम्बर २०१७ 
देह प्रकृति का भाग है, चेतना पुरुष का. मानव इन दोनों का सम्मिलित रूप है. प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं, एक दूसरे के पूरक हैं. देह के बिना आत्मा कुछ नहीं कर सकती और आत्मा के बिना देह शव है. इन दोनों के भिन्न-भिन्न स्वरूप को जानना ही प्रत्येक साधना का लक्ष्य है. इसीलिए भारतीय संस्कृति में दोनों की उपासना की जाती है. प्रकृति का उपयोग करके आत्मा का अपने चैतन्य स्वरूप का अनुभव कर लेना ही मानव जीवन की सर्वोत्तम उपलब्ध मानी गयी है. प्रकृति को माँ कहकर उसकी विभिन्न शक्तियों के अनुसार अनेक रूपों की कल्पना की गयी है. दुर्गा की स्तुति करके जब साधक अपने भीतर सात्विक शक्तियों को जगाता है, उसे स्वयं के पार उस चैतन्य का अनुभव होता है. जिसका अनुभव करने के बाद उसे परम संतोष का अनुभव होता है.  

आत्मशक्ति की करें साधना

२१ सितम्बर २०१७ 
शरद ऋतु के आगमन के साथ ही सारा भारत जैसे भक्ति के रस में डूब जाता है. पहले नवरात्रि के नौ दिन जिनमें देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है, पश्चात दशहरा और उसके बीस दिनों बाद दीपों का पर्व दीवाली. वैदिक काल से ये उत्सव हमारे मन-प्राणों को झंकृत करते आ रहे हैं तथा  भारत को एक सूत्र में बाँध रहे हैं. पुराणों के अनुसार देवासुर-संग्राम में जब देवताओं द्वारा असुरों का नाश सम्भव नहीं हुआ तब उन्होंने शक्ति की देवी की आराधना की, सब देवताओं ने उसे अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये. सद्गुणों व दुर्गुणों के रूप में देव तथा असुर हमारे भीतर ही वास करते हैं. इसका अर्थ है हमारे भीतर की दैवीय शक्तियाँ जब संयुक्त हो जाती हैं तब ही वे विकार रूपी असुरों का नाश कर सकती हैं. सात्विक दिनचर्या अपनाकर इस आत्मशक्ति को बढ़ाने का उत्सव है नवरात्रि. नौ दिनों की शक्ति की उपासना के बाद जब साधक का मन शुद्ध हो जाता है. वह आत्मबल से युक्त हो जीवन के प्रति नवीन उत्साह से भर जाता है. 

Tuesday, September 19, 2017

मन के जो भी पार हुआ है

२० सितम्बर २०१७ 
भगवद गीता में कहा गया है, मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र है और मन ही सबसे बड़ा शत्रु ! मन यदि धन, यश और पद की कामनाओं से युक्त है तो दुःख से उसे कोई नहीं बचा सकता. मन यदि अहंकार की तृप्ति करना चाहता है तो उसे कदम-कदम पर भय और दुःख का सामना करना पड़ेगा. जो मन स्वयं में ही तृप्त है, उसे न कोई भय है न ही पीड़ा. सात्विक भाव से युक्त मन सहज प्राप्त कर्मों को इसी भांति करता जाता है जैसे समय आने पर वृक्षों में फूल व फल लगते हैं. उसे न फल की इच्छा होती है न ही नाम की, वे तो उसी प्रकार प्राप्त होते हैं जैसे सुबह होने पर वातावरण में ताजगी और आह्लाद. जीवन के मर्म को जानना हो तो मन के पार जाना ही पड़ेगा, मन को हर दिन कुछ पलों के लिए विश्राम देने से वह मित्र बन जाता है. 

Saturday, September 16, 2017

आदिशिल्पी को करें नमन

१७ सितम्बर २०१७ 
आज विश्वकर्मा पूजा है. पुराणों में विश्वकर्मा देव का उल्लेख कई स्थानों पर अत्यंत श्रद्धा के साथ किया गया है. इन्हें आदिशिल्पी कहा जाता है. रावण की स्वर्णलंका और कृष्ण की द्वारिका का निर्माण इन्होंने ही किया था. इनके वशंजों ने ही विश्व की विभिन्न हस्तकलाओं जैसे सुनार, लोहार, बढ़ई, मूर्तिकार आदि की कलाओं को जन्म दिया. वास्तु शास्त्र के ज्ञाता इन देव की युगों-युगों से अर्चना की जाती रही है. भारत के पूर्वी प्रदेशों में, बंगाल तथा उत्तर-पूर्व भारत में विशेष तौर से हर वर्ष १७ सितम्बर को सभी अभियांत्रिकी संस्थानों में विश्वकर्मा देव की पूजा होती है. सभी औजारों तथा मशीनों की भी साफ-सफाई करके पूजा की जाती है. यहाँ तक कि साइकिलों, कारों, ट्रकों के मालिक अपने वाहनों को अच्छी तरह से स्वच्छ करके उनकी पूजा करते हैं. बदलते हुए समय के साथ उत्सवों का रूप बदल जाता है, वे अपने शुद्ध रूप में नहीं रह जाते, फिर भी उत्सव रोजमर्रा के जीवन में एक नया उत्साह भर देते हैं.

Thursday, September 14, 2017

सादा जीवन उच्च विचार यही सुखी जीवन का सार

१५ सितम्बर २०१७ 
यह काल संक्रमण का काल है. मूल्य बदल रहे हैं, संस्कृतियाँ और सभ्यताएं बदल रही हैं. देशों की सीमाएं बदल रही हैं. विश्व की उन्नति का आधार आर्थिक विकास माना जाने लगा है. व्यापारिक संबंध बढ़ रहे हैं, देश निकट आ रहे हैं. किन्तु इस सबके साथ मानव को विकास की बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ रही है. एक पीढ़ी पहले तक भी एक व्यक्ति को परिवार का सहयोग और प्रेम सहज ही मिल जाता था, जिसके कारण उसके भीतर मानवीय मूल्यों की स्थापना घर से ही आरम्भ हो जाती थी और विद्यालय उसमें विस्तार करता था. आज एकल परिवार होने के कारण बच्चे उस स्नेह और विश्वास से वंचित हैं, स्कूल भी इस कमी को पूरा नहीं कर पा रहा है. आये दिन स्कूलों में होने वाले हादसे अभिभावकों और बच्चों में एक भय की भावना भर रहे हैं. यदि मानव अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर ले, लोभ और दिखावे पर नियन्त्रण रखे. ध्यान और योग को अपना कर सुख के अविनाशी स्रोत को अपने भीतर ही खोज ले तो स्वतः ही उसकी यह अंधी दौड़ समाप्त हो जाएगी.  

जन-जन की भाषा है हिंदी

१४ सितम्बर २०१७ 
आज हिंदी दिवस है. ‘हिंदी’ एक ऐसी भाषा जिसने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया हुआ है. जो अनेकता में एकता का जीता-जागता उदाहरण है. बारहवीं शतब्दी से हिंदी की धारा भारत में जन-जन के हृदयों को आप्लावित कर रही है. मध्य काल में सूर, तुलसी हों या कबीर और रहीम, हिंदी की ध्वजा सदा ही लहराती रही है. आधुनिक काल में भी हिंदी के विद्वानों की एक लम्बी श्रंखला चलती आ रही है, जिसने जन मानस के हृदयों को हिंदी-सुधा से पोषित किया है. आज सामान्य जन की बोलचाल भाषा हो या साहित्य की भाषा दोनों ही क्षेत्रों में हिंदी फल-फूल रही है, कमी है तो बस इसकी कि आजादी के सत्तर वर्षों के बाद भी इसे राजकाज की भाषा नहीं बनाया जा सका. अनुवादित व क्लिष्ट भाषा के सहारे इस कार्य को नहीं किया जा सकता. मौलिक रूप से हिंदी में ही सरल भाषा में किया गया कार्य ही सरकारी कार्यालयों में अपनाना होगा वरना वहाँ यह केवल हिंदी दिवस तक ही सिमट कर रह जाएगी.


Wednesday, September 13, 2017

विस्मय से जब मन भर जाये

१३ सितम्बर २०१७ 
जीवन में कदम-कदम पर हमें कितनी ही आश्चर्यजनक स्थितियों का अनुभव होता है पर ज्यादातर हम उनका कोई न कोई उत्तर खोज कर मन को शांत कर देते हैं. विज्ञान के द्वारा जगत के कार्यकलापों का कारण खोजने लगते हैं. एक ऐसा आश्चर्य जिसका कोई निराकरण न हो सके विस्मय कहलाता है, और गहराई से देखें तो इस जगत का एक नन्हा सा रेत का कण भी मन को विस्मय से भर देने के लिए पर्याप्त है. हमारी देह की एक कोशिका भी अपने भीतर कितने रहस्य छिपाए है. विज्ञान के जवाब हमें भ्रमित करते हैं, ऐसा लगता है हम इसके बारे में सब जान सकते हैं. नींद भी एक रहस्य है और स्वप्न भी. चारों तरफ जैसे एक तिलिस्म छाया है. विस्मय से भरा मन ही फिर उस अज्ञात के सामने झुक जाता है. वह भी जैसे उस रहस्य का ही एक भाग बन जाता है.

Tuesday, September 12, 2017

स्वयं से जब परिचय हो जाये

१२ अगस्त २०१७ 
मन व इन्द्रियों की सहायता से हम बाहरी जगत को जानते हैं पर ‘स्वयं’ से अनजान बने रहते हैं. इस जगत को कोई कितना ही जान ले, सब कुछ कभी नहीं जान सकता. किन्तु ‘स्वयं’ को जिसने भी जाना है उसे यह अनुभव अवश्य हुआ है कि अब कुछ और जानना शेष नहीं है. आँख से हम देखते हैं, आँख दृश्य से पृथक है, देखने वाले हम भी दृश्य तथा आँख से पृथक हैं, अर्थात दृष्टा, दृश्य  तथा दर्शन सदा ही पृथक हैं. ‘स्वयं’ को जानना हो तो, जाननेवाले भी हम हैं, जानने का साधन भी हम हैं. ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेय जहाँ एक हो जाते हैं, वहीं ‘स्वयं’ का अनुभव होता है.  

Monday, September 11, 2017

लौट सकेगा जब मन भीतर

१३ सितम्बर २०१७ 
भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, जैसे कछुआ संकट आने पर अपने अंगों को भीतर सिकोड़ लेता है और उसके कठोर तन पर किसी चोट का असर नहीं होता, वह अपने को बचा लेता है. इसी तरह मन भी यदि किसी संकट के आने पर स्वयं को सिकोड़ना सीख ले, अपने भीतर एक ऐसा स्थान बना ले जहाँ जाकर बाहरी घटनाओं के असर से बचा जा सकता है तो मन भी स्वयं की रक्षा आसानी से कर लेता है. मन पर संकट आने का अर्थ है, उसका विकार ग्रस्त हो जाना, उसका चिंताग्रस्त हो जाना अथवा दुर्बल हो जाना. मन की रक्षा का अर्थ है समता में रहने की उसकी कला का विकास. यदि छोटी-छोटी बातों से मन कुम्हला जाता है तो देह भी स्वस्थ नहीं रह सकती. मन के आकुल-व्याकुल होते ही अंतस्रावी ग्रन्थियों से ऐसे स्राव निकलते हैं जो देह को रोगग्रस्त कर सकते हैं. मन की गहराई में स्थित एक स्थान जहाँ जाकर पूर्ण विश्राम मिलता है, वही उसका आश्रय स्थल है. नियमित ध्यान करने से इस स्थल पर जाने का मार्ग सहज हो जाता है.  

Saturday, September 9, 2017

मिटना जिसने सीख लिया है

९ सितम्बर २०१७ 
मन का स्वभाव है अभाव में जीना, आत्मा तृप्ति और संतोष चाहती है. मन की दृष्टि सदा कमियों की तरफ ही जाती है, आत्मा अपने आप में इतनी आनंदित होती है कि कमियां उसे नजर ही नहीं आतीं. मन को सदा नयेपन की तलाश है, आत्मा चिरंतन है. मन सदा भय में जीता है, आत्मा में होना ही अभय का दूसरा नाम है. मन मिटने से डरता है, आत्मा कुछ न होने में ही अपना होना जानती है. मन दुःख बनाता है, न हो तो आशंकित होता है, आत्मा किसी भी परिस्थिति में अडोल बनी रह सकती है. मन सदा अतीत अथवा भविष्य में जीता है, कभी अतीत की भूलों पर पछताता है और कभी भविष्य में होने वाले दुखों से घबराता है. आत्मा के लिए हर क्षण अपार सम्भावना लिए आता है. वर्तमान में रहना ही आत्मा में होना है. 

Thursday, September 7, 2017

जीवन का जो मर्म जान ले

८ सितम्बर २०१७ 
जीवन कितना पुराना है कोई नहीं बता सकता, वैज्ञानिकों को मानव के लाखों वर्ष पुराने जीवाष्म भी  मिले हैं. हम न जाने कितनी बार इस धरती पर आये हैं और भिन्न देहें धारण करके सुख-दुःख का भोग कर चुके हैं. शास्त्र कहते हैं यह देह हमें दो कारणों के लिए मिली है भोग और मोक्ष, पहला अनुभव तो हो चुका, जब तक दूसरा नहीं होगा, बार-बार देह लेकर आना होगा और मृत्यु को प्राप्त होना होगा. यदि त्याग पूर्वक भोग किया जाये तो मुक्ति का अनुभव इसी जन्म में हो सकता है. मानव जीवन के चार पुरुषार्थ भी यही कहते हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कर्म कहता है कि धर्म पूर्वक प्राप्त किया गया अर्थ ही कामनाओं के त्याग का हेतु बनता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. यदि धन अनीति से प्राप्त किया गया है वह कामनाओं को बढ़ाने वाला ही होगा. उस स्थिति में दुखों से मुक्ति सम्भव ही नहीं है. 

प्रेम गली अति सांकरी


साधना का पथ अत्यंत दुष्कर है और उतना ही सरल भी. जिनका हृदय सरल है, जहाँ प्रेम है, ऐसे हृदय के लिए साधना का पथ फूलों से भरा है, पर राग-द्वेष जहाँ हों, अभाव खटकता हो, उसके लिए साधना का पथ कठोर हो जाता है. कृपा का अनुभव भी उसे नहीं हो पाता, क्योंकि कृपा का बीज तो श्रद्धा की भूमि में ही पनपता है, अनुर्वरक भूमि में नहीं. जहाँ हृदय में ईश्वर प्राप्ति की प्यास ही नहीं जगी वहाँ उसके प्रेम रूपी जल की बरसात हो या नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता, जब मन में एक मात्र चाह उसी की हो तभी भीतर प्रकाश जगता है. उस चाह की पूर्ति के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता गौण है, वहाँ मन ही प्रमुख है, मन को ही प्रेम जल में नहला कर, भावनाओं के पुष्प अर्पित कर, श्रद्धा का दीपक जला, आस्था का तिलक लगा कर शांति का मौन जप करना होता है. यह आंतरिक पूजा हमें उसकी निकटता का अनुभव कराती है, साधक तब धीरे-धीरे आगे बढता हुआ एक दिन पूर्ण समर्पण कर पाता है.

Sunday, September 3, 2017

मृत्यु को जो मीत बना ले

३ सितम्बर २०१७ 
प्रकृति पल-पल बदल रही है, चाहे पेड़-पौधों की हो, पशुओं की हो या मानवों की. समय के साथ-साथ उनमें परिवर्तन आ रहा है. मानव को छोड़कर सब उसे सहज ही स्वीकारते हैं, वृक्ष बूढ़े होते हैं और देह त्याग देते हैं. मानव अजर-अमर रहना चाहता है, जरा को जितना हो सके दूर रखना चाहता है और मृत्यु से सदा ही भयभीत रहता है. यहाँ तक कि वृद्ध हो जाने पर भी उसे ऐसा नहीं लगता कि कोई भी क्षण जीवन का अंतिम क्षण हो सकता है. यदि बचपन से ही जीवन और मृत्यु दोनों की बात घर-परिवार, विद्यालय में की जाये तो कितने तरह के दुखों से बचा जा सकता है. तब न तो अधिक संग्रह करने की प्रवृत्ति का जन्म होगा और न ही मन में भय होगा. जीवन को सम्मान मिलेगा यदि यह सदा स्मरण रहे कि यह कभी भी हाथ से जा सकता है. मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं रहेगा जब यह स्मरण रहेगा कि एक दिन सब कुछ छूटने ही वाला है. 

Friday, September 1, 2017

भाव युक्त हो अंतर अपना

१ सितम्बर २०१७ 
जीवन में होने वाले अनुभवों में अधिकतर भीतर का भाव ही लौट-लौट कर आता है. जब किसी हृदय में परम के प्रति प्रेम का जागरण होता है तो वह प्रेम अपनी सुवास स्वयं ही बहा देता है,  इसके लिए शब्द जुटाने नहीं पड़ते. पका फल जैसे अपनी मिठास से भर कर खुदबखुद टपक जाता है,  भाव भरा अंतर भी इसी तरह व्यक्त हो जाता है. जिसने उसे अनुभव किया है उसने ही गीत गाए हैं. वह खुद भी नहीं जानता कितना बड़ा रहस्य अपने भीतर छुपाये है. जीवन स्वयं में एक रहस्य है, इसका रचियता भी और उसके प्रति समर्पित अंतर भी. जीवन धारा अविरल गति से बही जा रही है, किन्तु इसका आधार भी तो है. समयचक्र घूम रहा है, इसका केंद्र भी तो है. जगत गतिशील है, किन्तु गति का अनुभव कराने वाला अचल तत्व भी तो है. जिसने उसे अपने मन का मीत बना लिया वही दिव्य प्रेम को अनुभव सकता है.  

Thursday, August 31, 2017

जब स्वयं ही आधार बनेगा

३१ अगस्त २०१७ 
जीवन आज कितना कठिन होता जा रहा है. कहीं अत्यधिक वर्षा, कहीं तूफान, कहीं सूखा..प्रकृति के बदलते हुए रूप भी आज भयभीत कर रहे हैं. समाज में मूल्यों का इतना अधिक ह्रास हो गया है कि मंदिरों और आश्रमों में भी श्रद्धा और आस्था के नाम पर शोषण किया जा रहा है. ऐसे ही समय में जब बाहर कुछ भी भरोसे करने लायक न बचा हो, भीतर जाकर ही उस आधार को तलाशना होगा जो कभी नहीं बदलता. जो भीतर जाकर देख लेता है कि जिसका अपने मन पर ही कोई वश नहीं है, जिसे यही नहीं पता कि अगले पल मन में क्या विचार आने वाला है तो वह बाहर पर नियन्त्रण कैसे कर सकता है. वह नियन्त्रण करने की अपनी प्रवृत्ति का ही त्याग कर देता है. वह कुछ प्राप्त कर लेने की दौड़ से ही बाहर हो जाता है. वह समझ लेता है कि सुख को पाया नहीं जा सकता पर उसके प्रति समर्पित हुआ जा सकता है. अंतर में कृतज्ञता उपजती है. जीवन तब एक उपहार लगता है संघर्ष नहीं लगता. 


Monday, August 28, 2017

कली खिलेगी जिस पल मन की

२९ अगस्त २०१७ 
बसंत और बहार की ऋतु में प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है, इसका कारण है कि पेड़-पौधे व वृक्ष अपनी मंजिल पर पहुँच जाते हैं, अर्थात खिल जाते हैं. हमारा मन भी जिस दिन अपनी मंजिल को छू भर लेगा, उसका मौसम भी बदल जायेगा. अभी मन को तलाश है, वह कुछ पाना चाहता है, तभी दिन-रात किसी न किसी उधेड़-बुन में लगा रहता है. मन की कली अभी बंद है, भीतर ही भीतर सुगबुगा रही है, कोई स्पर्श उसे जगा सकता है. कोई पुकार उसे खिला सकती है. कोई कृपा उसे मुक्त कर सकती है. यह सब हो सकता है यदि मन यह मान ले कि वह अभी खिला नहीं है, कि अभी उसे बहार मिली नहीं है, और मन जिस राह पर अब तक चलता आया है उस मार्ग पर तो वह खिल नहीं सकता. मन को खिलने के लिए कोई श्रम नहीं करना है, बस अपने आप में ठहरना है, आखिर कली क्या करती है फूल बनने के लिए, बस स्वयं को धूप और हवा के आश्रय में छोड़ देती है.    

Sunday, August 27, 2017

घट-घट पावन प्रेम छुपा है

२८ अगस्त २०१७ 
हर आत्मा प्रेम से उपजी है, प्रेम ने उसे सींचा है और प्रेम ही उसकी तलाश है. माता-पिता शिशु की देह को जन्म देते हैं, आत्मा उसे अपना घर बनाती है. शिशु और परिवार के मध्य प्रेम का आदान-प्रदान उस क्षण से पहले से ही होने लगता है जब बालक बोलना आरम्भ करता है. अभी उसमें अहंकार का जन्म नहीं हुआ है, राग-द्वेष से वह मुक्त है, सहज ही प्रेम उसके अस्तित्त्व से प्रवाहित होता है. बड़े होने के बाद जब प्रेम का स्रोत विचारों, मान्यताओं, धारणाओं के पीछे दब जाता है, तब प्रेम जताने के लिये शब्दों की आवश्यकता पडती है. जब स्वयं को ही स्वयं का प्रेम नहीं मिलता तो दूसरों से प्रेम की मांग की जाती है. दुनिया तो लेन-देन पर चलती है इसलिए पहले प्रेम को दूसरे तक पहुँचाने का आयोजन किया जाता है. यह सब सोचा-समझा हुआ नहीं होता, अनजाने में ही होता चला जाता है. प्रेम पत्रों में कवियों और लेखकों के शब्दों का सहारा लिया जाता है. दूसरे के पास भी तो प्रेम का स्रोत भीतर छिपा है, उसे भी तलाश है. जीवन तब एक पहेली बन जाता है. 

Saturday, August 26, 2017

बीत रहा है पल-पल जीवन

२७ अगस्त २०१७ 
जीवन हर पल हमारे लिए चुनौतियाँ खड़ी करता है. यदि मन पल भर के लिए भी विचलित हो गया तो हम अपने मार्ग से च्युत हो जाते हैं. तभी तो कबीर कहते हैं, सत्य की राह तलवार की धार पर चलने के समान है. जिन आदर्शों को हम भीतर धारण करते हैं, यथार्थ की आंच पाते ही वे पिघलने लगते हैं, और हम फिर सामान्य बातों में उलझ जाते हैं और वह समय जो एक महत्वपूर्ण दिशा की और ले जाने का अवसर प्रदान कर सकने में सक्षम था, यूँही बीत जाता है. कितनी ही बार चलते-फिरते या किसी कार्य को करते समय मन में सहज स्फुरणायें उठती हैं, कुछ प्रेरणादायक वचन, कुछ योजनायें भीतर पनपती हैं. अल्प सा विचार करके जिन्हें कार्यान्वित किया जा सकता था परन्तु परिस्थितियों की हल्की सी भी असुविधा हमें पुनः अपने जीवन को यथावत चलते रहते देने के लिए पीछे ले जाने में सफल हो जाती है. प्रतिपल लक्ष्य की स्मृति बनी रहे तभी आत्मा का विकास सम्भव है.

Friday, August 25, 2017

अँधा अंधे ठेलिए दोनों कूप पडंत

२६ अगस्त २०१७ 
अंधश्रद्धा मानव को किस कदर विवेकहीन बना देती है इसका उदाहरण हरियाणा और पंजाब में हो रहे घटनाक्रम को देख कर मिल रहा है. राष्ट्र की सम्पत्ति को हानि पहुँचाने वाले इतना सा सच भी नहीं देख पा रहे हैं कि अंततः वे अपनी ही सम्पत्ति को नष्ट कर रहे हैं. जो साधना उनमें इतना सा भी विवेक जागृत नहीं कर सकी, उसका न होना ही अच्छा है. गुरू का काम है शिष्यों के जीवन से अज्ञान का अन्धकार दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाये, किंतु आज तथाकथित गुरू लोगों की श्रद्धा का लाभ उठाकर अपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग करते हैं. आश्चर्य होता है जब पढ़े-लिखे लोग भी उनकी चाल में फंस जाते हैं. आज भारत के लिए कितना दुखद दिन है जब हिंसा और आगजनी की घटनाएँ एक अपराधी को बचाने के लिए हो रही हैं. सभी जागरूक लोगों को ऐसे अंधभक्तों से भारत को बचाना होगा. 

Thursday, August 24, 2017

गणपति बप्पा मोरया

२५ अगस्त २०१७ 
आज गणेश चतुर्थी है. भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि ! प्रथम पूजनीय गणपति को सम्मानित करने की तिथि ! गणेश सभी देवताओं में अग्र हैं, वे मूलाधार चक्र के अधिष्ठाता हैं, विघ्न विनाशक हैं. उनके जन्म और कर्म के साथ कितनी कथाएं जुड़ी हैं, जिनका गहरा आध्यात्मिक अर्थ संतजन बताते हैं. गणेश भक्तों को अपने लगते हैं, अपने परिवार के सदस्य की तरह उनकी घर-घर में तथा सार्वजनिक स्थानों पर स्थापना की जाती है. वैसे तो वर्ष भर ही किसी न किसी रूप में गणेश की पूजा होती है पर आज के दिन विशेष आयोजन होते हैं. वे ज्ञान और कुशलता के प्रदाता हैं. रिद्धि और सिद्धि को देने वाले हैं. गणेश तत्व का अर्थ है शुभता और सात्विक शक्ति से ओतप्रोत ज्ञान. जब शुभ और मंगल के दाता गणेश की पूजा करने वाला स्वयं भी उन गुणों को स्वयं में धारण करता है तभी सही अर्थों में  गणेश चतुर्थी का उत्सव सफल होता है.

Wednesday, August 23, 2017

श्रेष्ठता का चयन करे जो

२४ अगस्त २०१७ 
जीवन निरंतर गतिशील है. यदि गति ऊपर की ओर हो अर्थात उन्नतिशील हो तो सद्गति कहलाएगी और यदि नीचे की ओर हो पतनशील हो तो दुर्गति कहलाएगी. कोई भी एक स्थान पर बने नहीं रह सकता. शिशु बालक बन रहा है, यदि उसका लालन-पालन उचित नहीं हुआ तो वह निरंकुश बालक बन जायेगा. बालक को यदि उचित वातावरण नहीं मिला तो वह दिशाहीन किशोर बन सकता है. किशोरावस्था में मार्गदर्शन न मिलने के कारण कितने ही युवा बुरी आदतों का शिकार हो जाते हैं. इसके विपरीत यदि शिशु को पर्याप्त स्नेह और संस्कार से सिंचित किया जाता है तो वह आदर्श बालक व कुशाग्र किशोर बनकर समाज के लिए उदाहरण बन सकता है. भगवद गीता में कृष्ण कहते हैं, कोई व्यक्ति किसी भी स्थिति में हो यदि उस क्षण वह तय कर ले कि उच्च जीवन को अपनाना है, उसकी दिशा और दशा तत्क्षण बदलने लगती है. हर क्षण हमारे जीवन की दिशा का चुनाव हमारे ही हाथ में होता है. 

Tuesday, August 22, 2017

थम कर चलना जो सीखेगा

२३ अगस्त २०१७ 
इस जगत की कितनी सारी महत्वपूर्ण घटनाएँ अपने आप हो रही हैं, वायु बह रही है, श्वासें चल रही हैं, देह में रक्त का संचरण हो रहा है. जीवन का अनमोल उपहार हमें अकारण ही प्राप्त हुआ है. इसको सार्थक करना ही हमारा एकमात्र कर्त्तव्य है. जीवन अर्थपूर्ण तभी बनता है जब भीतर के शांति स्रोत का पता चल जाता है. जब तक कोई दुविधा है, जीवन एक संघर्ष ही नजर आता है. शांति का अनुभव करने के लिए ध्यान का अभ्यास अति आवश्यक है. जैसे कोई यात्री घंटों से चल रहा हो और एक वृक्ष की निर्मल छाया में पल भर को विश्राम करने के लिए रुक जाये. इस विश्राम के बाद चलने का उसका आनंद पहले से बढ़ जायेगा. इसी तरह सब कुछ छोड़कर कुछ पलों के लिए खाली होकर बैठ जाना और मन को देखते रहना चित्त को अनोखी विश्रांति से भर जाता है.


जब जीवन से परिचय होगा

२२ अगस्त २०१७ 
जीवन की कितनी ही परिभाषाएं कितने ही व्यक्तियों ने गढ़ी हैं लेकिन जीवन इनसे कहीं अधिक विराट है, वह कभी भी पूरा-पूरा इनमें नहीं समाता. हमारे ऋषियों ने जिस जीवन को जानने व पाने की प्रार्थना की है, वह अनंत है, असीम है और आनंद से भरा हुआ है. उस विशालता को महसूस करने के लिए उतना ही बड़ा दिल भी चाहिए, एक नया दृष्टिकोण भी चाहिए और साथ ही एक गहन आत्मीयता की भावना भी. यदि कोई एक प्रेमी की दृष्टि से इस सृष्टि को निहारता है तो वह धीरे से अपना घूँघट सरका देती है, रहस्य की एक परत खुलती है. यह सही है कि हजार परतें अब भी शेष हैं किन्तु जीवन के साथ एक नया संबंध बनने लगता है, जिसमें कोई भय नहीं है, कोई कामना भी नहीं है, यह केवल साथ होने का संबंध है. इसमें हर क्षण एक नयेपन की अनुभूति होती है क्योंकि सृष्टि पल-पल बदल रही है.

Monday, August 21, 2017

जग जैसा जब देखें वैसा

२१ अगस्त २०१७ 
प्रत्येक आत्मा में ज्ञान पाने की सहज कामना होती है, एक बच्चा भी जन्मते ही अपने आस-पास के वातावरण से परिचित होना चाहता है. ज्ञान इन्द्रियों तथा मन के रूप में हमें जानने के सुंदर साधन प्राप्त हुए हैं, जिनके माध्यम से हम जगत को जानते हैं. जानने के इस क्रम में हम जगत के बारे में कई धारणाएं अथवा मान्यताएं बना लेते हैं, जिनका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं होता, जिसके कारण हमें कष्ट उठाना पड़ता है. यदि हमारे पास अपनी धारणा के पक्ष अथवा विपक्ष में कोई प्रमाण नहीं है, तो हम उस बात को न तो स्वीकार करें न ही अस्वीकार. उस स्थिति में हम तटस्थ रहकर ही स्वयं की रक्षा कर सकते हैं. इस जाननेवाले को जानने के लिए हमें इन साधनों को शुद्ध करने की  आवश्यकता है, मन जितना शुद्ध होगा उतना ही एकाग्र होगा. एकाग्र मन में जानने वाला यानि आत्मा अपने प्रतिबिम्ब को उसी तरह देख लेता है, जैसे शान्त झील में हम उसकी तलहटी को देख लेते हैं.  


Friday, August 18, 2017

विष भी जब अमृत बन जाये

१८ अगस्त २०१७ 
आकाश से जलधारा निरंतर बह रही है, मूसलाधार वर्षा हो रही है. धरती, पेड़-पौधे सब भीग रहे हैं, पंछी पत्तों में छुप गये हैं. कहाँ छिपा था यह नीर जो बादल बनकर बरस रहा है, क्या यह धरा से ही ऊपर नहीं उठा था. सागरों के ऊपर जब सूरज की किरणें छायी होंगी और उसे तप्त करके ऊपर उठा ले गयी होंगी, प्रकृति उस नमकीन जल को मीठा बनाकर फिर-फिर धरती को लौटा देती है. हमारा मन भी जब जगत के खारेपन को भीतर समा लेता है और उसे मृदु बनाकर लौटा देता है तो परमात्मा से जुड़ जाता है, अथवा कहें परमात्मा से जुड़कर ही ऐसा कर पाता है. हजार बूंदों के रूप में बारिश गीत गाती आ रही है. मन भी उस परमात्मा से जुड़कर अनंत भाव लुटा सकता है. उसके दामन में सब कुछ अनंत है. 

Thursday, August 17, 2017

सतरंगी यह जीवन सुंदर

१७ अगस्त २०१७ 
जीवन बहुआयामी है. विविधताओं से भरा है. प्रकाश की श्वेत किरण जैसे सात रंगों से बनी है, जीवन भी प्रेम, सुख, शांति, शक्ति, पवित्रता, आनंद और ज्ञान सप्त गुणों से ओतप्रोत है. इन गुणों का विकास ही साधक के लिए नित्य साधना है. प्रेम ही परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को एक सूत्र में बाँधता है. सुख की तलाश विज्ञान को नई खोजें करने की प्रेरणा देती है. शांति के वातावरण में ही संगीत आदि कलाओं का सृजन सम्भव है. शक्तिशाली तन और मन ही बदलते हुए समय में स्वयं को स्वस्थ रख सकता है. जीवन जब मर्यादाओं में रहकर आगे बढ़ता है तो दो तटों के मध्य बहती धारा की तरह एक पवित्रता का निर्माण करता चलता है. यही पावनता दिव्यता को जन्म देती है जो आनंद के रूप में मानव के भीतर प्रस्फुटित होती है. हृदय जब आनंदित हो तो सहज ही ऐसा अंतर्ज्ञान उपजता है जिसको पाने के बाद  हर समस्या का समाधान मिलने लगता है.

Wednesday, August 16, 2017

अध्यात्म की डगर सुहानी

१६ अगस्त २०१७ 
जीवन प्रतिपल बांट रहा है. हजारों युगों से एक क्षण भी रुके बिना पवन का संचार हो रहा है. तेज गति से पृथ्वी सूर्य का परिभ्रमण कर रही है. सूर्य की रश्मियाँ नित नये प्राणियों को जन्माने में सहायक हैं. मानव के भीतर कल्पना और बुद्धिमत्ता के अद्भुत संयोग से नित नये अविष्कार हो रहे हैं. कला और विज्ञान की ऊंचाईयों को इस युग ने स्पर्श किया है. इतना सब कुछ होने पर भी अपने आस-पास देखने पर एक निराशा और अभाव का दर्शन होता है, जिसके लिए बढती हुई जनसंख्या तथा मानव का बढ़ता हुआ लोभ, आपसी मतभेद और सम्प्रदायों के नाम पर होती हुई हिंसा जैसे कुछ कारण गिनाये जा सकते हैं. अध्यात्म के पास इन सभी समस्याओं का इलाज है. अध्यात्म मानव को  मानव, प्रकृति तथा सम्पूर्ण सृष्टि से एकत्व की भावना का अनुभव कराता है. अध्यात्म आज के समय की मांग है.   

Monday, August 14, 2017

तू ही जाने तेरा राज

१४ अगस्त २०१७ 
परमात्मा हमारे द्वारा इस जगत में प्रतिपल कितना कुछ कर रहा है. श्वास जो भीतर अनवरत चल रही है, उसी के कारण है. रक्त जो निरंतर गतिशील है, प्रेम जो शिशु की आँखों में झलकता है. मन की गहराई में आगे ही आगे जाने की ललक भी तो किसी अनाम ग्रह से आती है. जगत सदा मिलता हुआ प्रतीत होता है पर कभी मिलता नहीं, क्योंकि जो आज मिला है वह प्रतिपल बदल रहा है. परमात्मा जो सदा दूर ही प्रतीत होता है, निकट से भी निकट रहता चला आता है. जो जीवन उसके बिना हो ही नहीं सकता, उसे भी वह अपनी खबर नहीं होने देता, उससे बड़ा रहस्य और क्या हो सकता है. बस इसी तथ्य को जो जान ले वह निर्भार हो जाता है.

Friday, August 11, 2017

अभी-अभी वह यहीं कहीं हैं

११ अगस्त २०१७ 
समय की धारा प्रतिपल अविरत गति से आगे बढ़ती जा रही है. यह पल जो अभी-अभी उगा था खो गया है. पलक झपकते ही पल खो जाता है. संत कहते हैं जो इस पल में जाग गया, वह जिंदगी से उसी तरह मिल सकता है जैसे कोई प्रेम के क्षणों में अपने प्रिय से मिलता है. जब किसी के निकट होना ही पर्याप्त होता है, उससे कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि उस क्षण को साथ-साथ जीने के लिए, उसी तरह समय के एक नन्हे पल के पीछे छिपे अनंत से मिलना होता है. परमात्मा की मौजूदगी का अनुभव सदा ही एक क्षण में होगा, वह क्षण कौन सा होगा यह कोई नहीं कह सकता पर जिसने कभी क्षण में ठहरना नहीं सीखा वह उस पल को भी खो देगा. 

Tuesday, August 8, 2017

खाली मन ही टिके योग में

८ अगस्त २०१७ 
योग का एक अर्थ है कर्मों को इस कुशलता से करना कि कर्म के बाद न तो पश्चाताप रह जाये कि इससे अच्छा कर सकते थे न ही कोई आशंका ही शेष रहे कि पता नहीं इस कर्म का फल कैसा होगा. कर्म करने के पूर्व जिस सहज स्थिति में मन था उसी में बाद में भी रहे तो  कर्मयोग सिद्ध हो जाता है. अपरिग्रह योग की साधना में अति आवश्यक यम है. अपरिग्रह का शाब्दिक अर्थ है अनावश्यक संग्रह न करना, यह संग्रह वस्तुओं का हो सकता है, संबंधों का हो सकता है और विचारों का भी हो सकता है. व्यक्ति, वस्तु या विचार के प्रति आसक्ति या मोह की भावना ही परिग्रह है, जो दुख का कारण है. परिग्रह कृपणता को जन्म देता है और अपरिग्रह साधक को उदार बनाता है. मन यदि व्यर्थ के विचारों से भरा हुआ है तो चिंता और दुःख से कैसे बचा जा सकता है. योग की साधना करते-करते जब मन व्यर्थ तथा क्लिष्ट संस्कारों से मुक्त हो जाता है तो सहज ही अपरिग्रह सधने लगता है.

Monday, August 7, 2017

यह राखी बंधन है ऐसा

७ अगस्त २०१७ 
रक्षा बंधन का अर्थ है अपनी सहज स्वीकृति और प्रेम से अन्य की रक्षा का वचन देकर उससे बंध जाना. यह प्रेम का ऐसा अनोखा बंधन है जिसमें बाँधने वाला और बंधने वाला दोनों स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं. हमारे पुराणों में भी इस उत्सव का उल्लेख है, अर्थात इसकी परंपरा अत्यंत प्राचीन है. पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्वप्रथम इन्द्राणी ने अपने पति की रक्षा के लिए मन्त्रों से सिद्ध सूत्र बाँधा था. द्रौपदी ने कृष्ण को और लक्ष्मी ने राजा बलि को भी रक्षा सूत्र बाँधा था. पहले-पहल ब्राह्मण भी अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बाँधते थे. एक दूसरे के सम्मान की रक्षा के लिए इस सूत्र को बाँधा जाता था. कालांतर में यह भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा. राखी का यह धागा मर्यादा का प्रतीक तो है ही, संकल्प की दृढ़ता का प्रतीक है और साथ ही समाज में सभी की समानता और भाईचारे का प्रतीक भी है. 

Friday, August 4, 2017

निज श्रम से ही भाग्य बनेगा

५ अगस्त २०१७ 
योग शब्द का एक अर्थ है जुड़ना अथवा जोड़ना. पहले देह को मन से फिर मन को आत्मा से और अंत में परमात्मा से जोड़ना है. आत्मा बीज रूप में सबके भीतर है पर योग द्वारा ही उस तक पहुंचा जा सकता है. इसके लिए मन की धरती पर उस बीज को बोकर साधना के जल से सींचा जाता है. अपनी-अपनी रूचि के अनुसार कोई भक्ति से, कोई ज्ञान से तथा कोई निष्काम कर्म से इस पौधे को बड़ा करता है. तीसरे यम ‘अस्तेय’ का पालन सभी के लिए आवश्यक है. ‘अस्तेय’ का शाब्दिक अर्थ है चोरी न करना. चोरी शब्द का यहाँ बहुत व्यापक अर्थ है, किसी की अनुपस्थिति में उसकी वस्तु का उपयोग भी चोरी ही कहा जायेगा. कम श्रम के बदले अधिक धन की लालसा, कर्तव्यों से पीछे हटना, व्यापार में ज्यादा मुनाफा कमाना, दूसरों के विचारों की चोरी भी स्तेय में आएगा. यदि मन में कहीं भी चोरी का संस्कार है, तो वह अन्यों के प्रति संदेह भी जगाता है. साधक को मन की निर्मलता के लिए किसी भी रूप में बिना अर्जित की हुई वस्तु का लोभ नहीं रखना चाहिए. 

Thursday, August 3, 2017

अहिंसा परमो धर्मः

४ अगस्त २०१७ 
एक बार यदि साधक यह निर्णय ले लेता है कि उसे योग मार्ग पर आगे बढ़ना है, जीवन के परम लक्ष्य को पाना है अर्थात सर्वदुखों से सर्वकाल के लिए मुक्त होना है तो तत्क्षण उसे साधना आरम्भ कर देनी चाहिए. चाहे आधा घंटा ही की जाये, प्रतिदिन नियमित की गयी साधना फल देने लगती है. भूतकाल में किसी न किसी को दुःख दिया होगा, मन ही मन उससे क्षमा मांगकर भविष्य में किसी को कोई दुःख नहीं देना है अर्थात अहिंसा के पालन का व्रत भी ले लेना चाहिए. क्रोध हिंसा का ही एक रूप है. दोष दृष्टि भी हिंसा है. मन में क्षोभ का भाव जगे अथवा द्वेष का ये सभी हिंसा हैं. मन को शांत रखने के लिए अहिंसा का पालन अति आवश्यक है.


Wednesday, August 2, 2017

सांच बराबर तप नहीं

३ अगस्त २०१७ 
योग के साधक को आसन व प्राणायाम के साथ-साथ यम व नियम का पालन करना नहीं भूलना चाहिए. योग का अंतिम लक्ष्य मुक्ति की प्राप्ति है, जिसका अर्थ है सर्वदुखों से मुक्ति. जो मन के विकारों से मुक्त हुए बिना सम्भव ही नहीं है. यम और नियम मन को शुद्ध करने के उपाय हैं, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य, ये पांच यम हैं तथा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान ये पांच नियम हैं. सत्य के पालन करने का अर्थ है मनसा और वाचा में समता. जो मन में है वही वाणी से उजागर होने लगे तो साधक सत्य के निकट पहुँचने लगता है. किसी की कही बात को ज्यों की त्यों कहना, उसमें अपनी ओर से जरा भी फेर-बदल न करना, वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितयों को जैसी वे हैं वैसा ही देखना भी सत्य व्यवहार कहा जाता है. अपने लाभ के लिए असत्य का सहारा लेने वाला तो सत्य से बहुत दूर है.


Friday, July 28, 2017

एक उसी की चाहत हो जब

२८ जुलाई २०१७ 
साधक के लिए सबसे जरूरी बात है कि वह प्रामाणिक बने. उसे अपने मन की गहरी आकांक्षा को जानना होगा. अध्यात्म के मार्ग पर चलकर वह क्या पाना चाहता है. परमात्मा और उसके मध्य यदि कोई भेद अब भी शेष है तो इसका कारण परमात्मा नहीं साधक के मन का दुराव है. यदि किसी क्षण में वह अपने मन को पूरी सच्चाई से परम के सामने खोल कर रख देता है, कोई छिपी हुई कामना अनदेखी नहीं रहती जिसे वह परमात्मा के द्वारा पूरा करना चाहता है, उसी क्षण मिलन घटता है. स्वयं को जानने के लिए ही योग साधना है. आसनों के द्वारा देह शुद्धि तथा ध्यान के द्वारा मन की स्थिरता प्राप्त करके ही हम स्वयं को जान सकते हैं. इससे पहले की गई भक्ति सकाम भक्ति होती है. जब तक हम परमात्मा से मांगते हैं पर परमात्मा को नहीं मांगते तब तक मुक्ति सम्भव नहीं.

Wednesday, July 26, 2017

सारा जग जब मीत बनेगा

२६ जुलाई २०१७ 
क्रोध और मोह से विहीन, राग-द्वेष से मुक्त जीवन ही असली जीवन है. यदि हम इन विकारों से मुक्त नहीं हो पाते तो इसका कारण बाहर नहीं है. हमारी असफलता का कारण भीतर ही है. सुख की कामना ही मोह है. मोह के कारण ही हमें भय सताता है और अज्ञान के कारण ही इस सत्य को हम देख नहीं पाते. सुख के जिन साधनों के पीछे जाकर पहले-पहल हम मुग्ध होते हैं बाद में वही दुःख का कारण बन जाते हैं. हमारे सुख में जो बाधक हो उसके प्रति द्वेष करते हैं पर नहीं जानते कि शुद्ध अहिंसा जब किसी हृदय में घटती है उसके लिए कोई पराया नहीं रह जाता. जग के साथ वह एक हो जाता है और उसके अंतर्मन में करुणा जल अनायास ही बहने लगता है.

Sunday, July 23, 2017

इस क्षण में ही मिल सकता वह

२४ जुलाई २०१७ 
केवल वर्तमान का यह नन्हा सा पल ही सत्य है. यही क्षण अपने भीतर अनंत को छुपाये है. जैसे एक परमाणु में असीम शक्ति छिपी है वैसे ही एक क्षण में अनंत समय छिपा है. वर्तमान में रहने की कला ही ध्यान है. यदि कोई इस कला को सीख लेता है तो वह कभी समय की कमी महसूस नहीं करता. वास्तव में वर्तमान के सिवा कोई समय ही नहीं है, सब कुछ इसी क्षण में है और इसी वक्त है. अनंत काल जो बीत गया और अनंत काल जो आने वाला है, वह इसी क्षण में है अन्यथा नहीं है. जो आज अतीत बन गया है, वह तो अभी है नहीं, जो भावी है वह भी अभी नहीं है. धर्म का अनुभव वर्तमान में ही हो सकता है. 

Saturday, July 22, 2017

निज स्वभाव है सदा एक रस

२३ जुलाई २०१७ 
संत, शास्त्र और हमारे जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि धर्म ही हमें थामता है. धर्म जो हमारा स्वभाव है, वही ताओ है, वही नियम है, वही ऋत है और वही जानने योग्य है. हम इस जीवन में अनेक लोगों से मिलते हैं पर खुद से मिलना मृत्यु तक टालते रहते हैं. हम जगत को महत्व देते हैं पर जो इस जगत को देखता है, उस आत्मा को अनदेखा ही रहने देते हैं. द्रष्टा दृश्य से बड़ा है या छोटा ? छोटी सी आँख में इतना बड़ा आकाश समाने की शक्ति है, छोटे से मन में सारा ब्रह्मांड समा जाता है. कितनी अपार शक्ति है हमारे भीतर. अनेक जन्मों के अनंत संस्कार मन पर अंकित हैं. स्वयं को पहचान कर ही हम सदा अडोल रह सकते हैं.

Friday, July 21, 2017

पूर्ण पूर्ण से ही उपजा है

२१ जुलाई २०१७
जीवन में होने वाला हर अनुभव हमें पूर्णता की ओर ले जाने के लिए है. हर आत्मा अपने भीतर सत्य की सम्भावना लिए हुई जन्मती है. सत्य की झलक उसे मिल भी सकती है और अंधकार में खो भी सकती है. सबसे पहला सत्य है हमारा स्वयं का अस्तित्त्व. मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार के रूप में अंतःकरण. मन की शक्ति अपार है, जिसका सही-सही ज्ञान होने पर हम इसका सदुपयोग करना सीख जाते हैं. मन के संस्कारों को शुद्ध करते हुए हम उसे उसके मूल तक ले जाते हैं, जहाँ से उसे पोषण मिलता है और वह उस तृप्ति का अनुभव करता है जिसकी उसे तलाश है. 

Thursday, July 20, 2017

तू प्रेम का सागर है

२० जुलाई २०१७ 
परमात्मा को हटा दें तो इस जगत में बचता ही क्या है ? उसका ऐश्वर्य, उसकी विभूतियाँ और उसका अनंत साम्राज्य ही चारों ओर फैला है. मानव चाहे तो उसका भागीदार बन सकता है अन्यथा मात्र पहरेदार ही रह सकता है. अपना जान के उसे पुकारे अथवा तो उसे भुलाकर सुख-दुःख के झूले में ही झूलता रहे. प्रेम को हटा दें तो भी कुछ नहीं बचता, अपनापन, आत्मीयता और दुलार यदि जीवन में न हों तो मरुथल बन जाता है जीवन. मानव चाहे तो अपना अहंकार खो कर उनमें डूब सकता है अन्यथा संबंधों में भी व्यापार ही चलता है.  

Wednesday, July 19, 2017

जिसने जाना राज अनोखा

१९ जुलाई २०१७ 
संत जन सदा ही कहते हैं, मानव देह दुर्लभ है. वाणी भी इसी देह में सम्भव है. अनुभव करने की शक्ति, स्वयं को जानने की शक्ति, जीने की शक्ति, सोचने की शक्ति इसी में मिलती है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इसी देह में प्राप्त होते हैं. इसी में रहकर परम का अनुभव किया जा सकता है. किसी अन्य के लिए परम का अनुभव नहीं करना है, परम के लिए भी नहीं, स्वयं के लिए. स्वयं का सही का आकलन करने के लिए ही उसका अनुभव करना है. हम उसी असीम सत्ता का अंश हैं, उसकी शक्ति हममें भी है, उस का अनुभव हम कर सकते हैं, यह देह इसी काम के लिए मिली है. वाणी का वरदान जो हमें मिला है, अब वह वाणी किसी को दुःख न दे, पूर्णता को प्राप्त हो. बुद्धि जो सदा छोटे दायरे में सोचती रही है, अब उस परम को ही भजे. हम पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ने को ही जीवन कहे चले जाते हैं. इतना सुंदर जीवन केवल मृत्यु की प्रतीक्षा ही तो नहीं हो सकता, अवश्य ही इसके पीछे कोई राज है, और जिसका पता केवल परम ही बता सकता है.  

Tuesday, July 18, 2017

राम रतन धन पायो

१८ जुलाई २०१७ 
संत कहते हैं, जिसकी हमें तलाश है वह मिला ही हुआ है. वे कहते हैं, यकीन कर लें और अपनी जेबें जरा टटोलें, हीरा पड़ा है.. जो इस बात पर यकीन करके खोजेगा सचमुच हीरा मिल जाएगा. मिलते ही जोर से हँसी आती है तब. खुद को ही खोजते-फिरते रहे थे, खुद को ही मिल नहीं पाते. जिनकी नजरें सदा बाहर लगी हैं भीतर कभी झांक ही नहीं पाते. एक दिन जब उसकी खबर हो जाएगी जो भीतर छिपा है तब एक ऐसा फूल खिलेगा, जो कभी नहीं मुरझाता. ऐसा नहीं होता तो कोई दिल भक्ति के गीत नहीं गाता.


Sunday, July 16, 2017

नित नूतन जब जग लगता है

१७ जुलाई २०१७ 
हम जो भी करते हैं, सोचते हैं या कहते हैं, वह निन्यानवे प्रतिशत बासी होता है. हम पुराने को ही दोहराते रहते हैं. सुबह अलार्म सुनकर बिस्तर छोड़ते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. अभ्यास वश ही पैर चप्पल तलाशते हैं, फिर अभ्यास वश ही ब्रश आदि, देह को जिन कामों का अभ्यास हो गया है, वह मशीन की तरह करता जाती है. फिर कोई विचार उड़ता हुआ सा मन में आ जाता है, उसके प्रति प्रतिक्रिया भी पूर्व के अनुसार ही होती है. हमारे इर्द-गिर्द जो कुछ भी होता है वह भी तो दोहराता है स्वयं को. एक चक्र की भांति हम उसमें ऊपर-नीचे होते रहते हैं, कहीं पहुँचते नहीं. कुछ नया हो तभी मानव बुद्धि की सार्थकता है. प्रतिदिन या फिर प्रतिपल नया होने के लिए प्रकृति को क्या कुछ विशेष करना पड़ता है, इतना ही तो कि परिवर्तन का वह प्रतिरोध नहीं करती. जीवन को जिस रूप में वह आता है सहज स्वीकारने से नयापन बना ही रहता है. जब कोई पूर्वाग्रह, पूर्व मान्यता न हो, अपनी या दूसरों की विशेष इमेज के प्रति कोई राग न हो तब हर पल कुछ नया भी होगा तो वह सहज स्वीकार्य होगा.   

Saturday, July 15, 2017

आयेगी जब समता मन में

१६ जुलाई २०१७ 
जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि’ ये शब्द हम सभी ने न जाने कितनी बार सुने हैं. जब कोई व्यक्ति हमारे दृष्टिकोण को समझ नहीं पाता, हम अपने को समझा लेते हैं कि उनके पास वह दृष्टि ही नहीं है जो हमारी बात को समझ सकें. किन्तु इस बोध वाक्य का अर्थ बहुत गहरा है. यह जगत हमें वैसा दिखाई देता है जैसा हमारा मन होता है. यदि मन उदास है, नकारात्मक है तो जगत के प्रति शिकायतों से भर जायेगा. शिकायती मन और भी ज्यादा उदासी से भर जायेगा, क्योंकि परिवर्तन के लिए ऊर्जा शक्ति चाहिए, नकारात्मक भाव ऊर्जा का हरण शीघ्र कर लेते हैं. यदि प्राण शक्ति बढ़ी हुई है, मन प्रफ्फुलित है तो जगत सुंदर दिखाई देगा. इस स्थिति में भी परिवर्तन नहीं लाया जा सकेगा,  क्योंकि जब सब कुछ ठीक है तो कैसा परिवर्तन. मन यदि समता में स्थित है, तब वह जैसा है वैसा ही दिखाई पड़ेगा. जहाँ आवश्यक है परिवर्तन तब सहज ही होगा, जीवन एक ऊपर की ओर ले जाने वाली यात्रा बन जायेगा.  

Wednesday, July 12, 2017

छंद बद्ध हो जब जीवन

१३ जुलाई २०१७ 
जैसे प्रकृति में एक लय है, एक छंद है, एक नियमबद्धता है, एक अनुशासन है, वैसा ही यदि जीवन में घटित होने लगे तो जीवन आनंदपूर्ण हो सकता है. समय आने पर कैसे अपने आप ही पत्तियां झर जाती हैं, वृक्ष अपनी कुरूपता को सहज ही स्वीकार करता है और उसमें भी एक सौन्दर्य का निर्माण हो जाता है. वृद्धावस्था को यदि सहजता से स्वीकार लिया जाये तो उसमें भी एक सौन्दर्य है. अस्वस्थता में भी मन कैसे स्थिर हो जाता है, अकड़ चली जाती है, बुखार में भी मुख पर एक चमक आ जाती है, इन्हें निमन्त्रण नहीं देना है पर यदि किसी कारण वश देह स्वस्थ नहीं है, तो उसे पहले स्वीकार करके फिर आवश्यक कदम उठाने हैं. मन यदि ‘हाँ’ की भाषा सीख गया है, तो उसकी ऊर्जा एक लय में बंध जाती है, नकार की भाषा उसे अस्त-व्यस्त कर देती है.

Tuesday, July 11, 2017

प्रतिपल बदल रहा है जग यह

१२ जुलाई २०१७ 
हमारे दुखों का कारण हमारे ही भीतर है, इसका ज्ञान होते ही हम सबल हो जाते हैं. जिस वस्तु का निर्माण हमने किया है उसे नष्ट करने की क्षमता भी तो हमारे ही पास है. यदि जगत हमारे दुखों का कारण हो तब तो हम असहाय हैं, क्योंकि जगत को बदलने की क्षमता हमारे पास है ही नहीं, जगत अपनी राह चलेगा ही. यदि बाहरी कारण हमारे अंतर्मन की दशा को प्रभावित करते हैं तब तो हम कभी भी प्रसन्न नहीं रह सकते क्योंकि बाहर तो सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है. मौसम ही अनुकूल-प्रतिकूल होते रहते हैं. व्यक्ति बदल जाते हैं. यहाँ तक कि हमारा खुद का मन भी सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग भावों में रहता है. बस एक हम ही हैं जो कभी नहीं बदलते, जो अनंत काल से जैसे थे अनंत काल तक वैसे ही रहेंगे. पर हम तो अपने उस न बदलने वाले स्वयं से कभी मिले ही नहीं, इसलिए कभी ख़ुशी कभी गम के गीत ही गाते रहे. 

Monday, July 10, 2017

बने पथिक कोई उस पथ का

११ जुलाई २०१७ 
साधना का पथिक अपने भीतर सदा ही उस साम्राज्य में रहना चाहता है जहाँ एक रस शान्ति विराजती है. उसके अंतर से प्रेम की ऊर्जा किसी विशेष वस्तु, व्यक्ति अथवा घटना के प्रति प्रवाहित नहीं होती, वह निरंतर बहती रहती है जैसे जल से आप्लावित मेघ सहज ही जलधार बहाते हैं. जिस लोक में वह विचरना चाहता है, वह अग्नि सा पावन भी है और हिमशिखरों के समान शीतल भी. वहाँ तृप्ति की श्वास ही ली जा सकती है. जब किसी के भीतर इतनी सात्विक ऊर्जा भर जाये तो वह सहज ही श्रम करने का इच्छुक होगा, इस श्रम में कोई थकावट नहीं होगी, वह सहज होगा जैसे प्रकृति में सब काम सहज हो रहे हैं, क्योंकि प्रकृति सदा ही उस शांति से जुडी है. सेवा का फूल ऐसी ही भूमि में खिलता है. 

हर उलझन के पार हुआ जो

१० जुलाई २०१७ 
योग साधना का उद्देश्य है मोक्ष, अर्थात सारे दुखों से मुक्त हो जाना. जब तक जीवन में एक भी दुःख है, हम बंधे हैं, समस्या छोटी हो या बड़ी..मन को स्वयं तक केन्द्रित रखती है. किसी के जीवन में एक भी समस्या न हो ऐसा होना तो सम्भव ही नहीं है, हाँ यह हो सकता है कोई उनके प्रति सजग ही न हो. जीवन में दुःख है, पहले तो यह स्वीकारना होगा, मन यदि किसी भी बात पर उलझन महसूस करता है तो इसका अर्थ है वह बंधा है. योग हमें संवेदनशील बनाता है, भीतर जाकर ही पता चलता है मन कैसे बंधता है और फिर उसे खोलने के उपाय भी भीतर ही मिलते हैं. 

Saturday, July 8, 2017

गुरू हमारे मन मन्दिर में

९ जुलाई २०१७ 
जीवन में गुरू का पदार्पण एक अद्वितीय घटना है, इसे एक महान घटना भी कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. जब किसी के मन में सत्य के लिए, गुरू के लिए प्यास जगती है तो परमात्मा की व्यवस्था से गुरू का आगमन होता है. यह सही है कि शिष्य ही गुरू को नहीं खोजता गुरू भी किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा शिष्य तक पहुँच जाते हैं. जब तक जीवन में गुरू की सच्ची आवश्यकता महसूस नहीं हुई है तब तक हम उसके महत्व को समझ नहीं पाते, लेकिन उसकी इतनी कृपा है कि अपने ज्ञान और प्रेम के बल पर वह हमारे मन में उस चाह को भी जगाता है. इसलिए चाहे अभी हमें गुरू के महत्व की जानकारी हो या न हो, गुरू के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने की ललक भीतर जगाएं और व्यास पूर्णिमा के इस सुंदर पर्व पर अपने जीवन को सुंदर दिशा दें. 

Friday, July 7, 2017

नये संस्कार उगें जब मन में

१० जुलाई २०१७ 
कभी-कभी न चाहते हुए भी हमसे ऐसे कृत्य हो जाते हैं, जिन पर बाद में पश्चाताप होता है. कभी मुख से ऐसे वचन निकल जाते हैं जिन्हें बोलने के बाद हमें लगता है, इनकी जरूरत ही नहीं थी. इनका कारण हमारे भीतर के क्रोध आदि विकार हैं, जो जरा सी परिस्थिति भी अनुकूल पाते ही सिर उठा लेते हैं अथवा तो जब उनके फल देने का वक्त होता है, परिस्थिति पैदा कर लेते हैं. क्रोध, मान, मोह, माया आदि पूर्व कर्मों के फल हैं. भीतर जो भी भाव उठते हैं वे संस्कारों के कारण होते हैं, संस्कार पूर्वकर्मों के अनुसार होते हैं, हमें उनसे प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है. स्वयं का ज्ञान होने पर ही यह पता चलता है. आत्मा के गुणों के आधार पर जो कर्म हम करते हैं, वे ही नये संस्कार बनाते हैं, अन्यथा हम बार-बार पुराने ढंग से ही जिए चले जाते हैं. सम्मान कभी भी वर्चस्व से नहीं समानता से प्राप्त किया जाता है, प्रेम और परोपकार से प्राप्त किया जाता है.

Wednesday, July 5, 2017

स्वाध्याय का फूल खिले

६ जुलाई २०१७ 
सुबह से शाम तक हम अनगिनत सूचनाओं को प्राप्त करते हैं, अख़बार, टेलीविजन, पत्रिकाएँ, मित्रों व पुस्तकों के माध्यम से हम जगत का ज्ञान प्राप्त करते हैं. आजकल तो सुबह-सुबह मोबाइल पर ही सुंदर ज्ञान के सूत्र पढने को मिलते हैं किन्तु इस ज्ञान से हमारा आध्यात्मिक विकास नहीं होता. इसके लिए तो साधना के पथ पर कदम रखना ही होगा. जीवन में एक अनुशासन हो, नियमित योगाभ्यास व व्यायाम हो, उचित समय पर सोना व जगना हो और स्वाध्याय हो. स्वाध्याय का अर्थ है केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं है, इसका एक अर्थ है स्वयं का अध्ययन. स्वयं का ज्ञान होने पर ही हम स्वयं का अध्ययन कर सकते हैं. गुरू अथवा शास्त्रों के माध्यम से हमें स्वयं का पता चलता है. स्वयं का ज्ञान ही हमें संसार की दौड़ से मुक्त कर देता है, यही वास्तविक ज्ञान है. इसके होने पर जीवन पूर्ववत् चलता रहता है बस मन जिस शांति व स्थिरता का अनुभव करता है, वह किसी बाहरी घटना से खंडित नहीं होती.

Tuesday, July 4, 2017

मन तू अपना मूल पिछान

५ जुलाई २०१७ 
साधना के पथ पर चलते समय इस बात का निरंतर ध्यान रखना होगा कि हम अपने मूल स्वभाव की और जा रहे हैं या नहीं. ऐसा नहीं कि स्वयं को विशेष मानकर अथवा तो औरों को अपने पथ में बाधा मानकर हम मन में विकार जगा लें. हमारी दिशा सही होनी चाहिए. अध्यात्म के पथ पर जो धैर्यवान है, वह एक दिन मंजिल तक अवश्य पहुँचेगा. जब तक हम अपन शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते, परमात्मा के सच्चे स्वरूप को नहीं जान सकते. शांति, प्रेम, आनंद आदि आत्मा का स्वभाव है, हमें इनका उपयोग करना है. ऐसा करने से सबसे पहले उसका लाभ स्वयं को मिलता है तथा बाद में औरों को मिलता है. 

Monday, July 3, 2017

ज्ञान बिना सुख इक सपना है

४ जुलाई २०१७ 
संत कहते हैं, सुख के पीछे जाने से दुःख पीछे आता है, ज्ञान के पीछे जाने से सुख पीछे आता है. समझदारी तो इसी में हुई कि हम ज्ञान का अनुशीलन करें. भगवद्गीता में कृष्ण ने सुंदर शब्दों में ज्ञान की व्याख्या की है. वैराग्य की भावना, इन्द्रियों का निग्रह, शोक और भय से मुक्ति, अहंकार का त्याग ये सभी ज्ञान के लक्षण हैं. दुःख का कारण सुख की लालसा है, मिल जाने पर उसके खो जाने का भय भी दुःख का कारण है और बाद में उसकी स्मृति भी दुःख का कारण है. ज्ञान का चिंतन करने से ही मन शांति का अनुभव करता है और शांति के बाद उपजा सुख शाश्वत होता है. 

Sunday, July 2, 2017

स्वयं को जिसने जान लिया है

३ जुलाई २०१७ 
हम परमात्मा की पूजा करते हैं, उससे अपने व परिवार जनों के सुख के लिए प्रार्थना करते हैं. किन्तु मन में किसी न किसी रूप में संदेह बना ही रहता है. यदि किसी को उस पर पूर्ण विश्वास हो तो मौन ही उसकी प्रार्थना होगी, तब उसे कुछ माँगने की जरूरत ही नहीं होगी. परमात्मा से हमारा रिश्ता बिलकुल वैसा ही है जैसा खुद के साथ होता है. जितना-जितना खुद से हमारा परिचय प्रगाढ़ होता जाता है, खुदा हमारे करीब होता जाता है. यदि कोई स्वयं को बेशर्त प्रेम करता है तो परमात्मा को प्रेम करता ही है. स्वयं को प्रेम करने के लिए खुद को जानना भी तो आवश्यक है. यदि हम स्वयं को जानते हैं तो ही उसे भी जानते हैं.

Saturday, July 1, 2017

दो के पार ही वह मिलता है

२ जुलाई २०१७ 
बादल बरस रहे हैं, धरती हरी-भरी हो रही है. कुछ लोग इस वर्षा का आनंद उठा रहे हैं तो कितने ही लोग बाढ़ के कारण प्रभावित हुए हैं और अपने घरों से उन्हें सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा है. जीवन सदा ही विरोधाभासों से घिरा हुआ है. यहाँ दिन के साथ रात और सुख के साथ दुःख मिला हुआ है. हमारी नजर यदि द्वन्द्वों के पार एकरस अस्तित्त्व को देखने में सक्षम नहीं होती है तो हम जीवन को उसके वास्तविक रूप में कभी नहीं देख पाते. कभी हँसना तो कभी रोना यही तो जीवन नहीं हो सकता. सारी आपदाओं के पार भी एक ऐसी सत्ता है जो सदा निर्विकार है, जो हमारा मूल है. उससे मिलना ही जीवन से मिलना है.

Thursday, June 29, 2017

पहला सुख निरोगी काया

३० जून २०१७ 
बचपन में हम सबने एक कहानी सुनी है, एक व्यक्ति अपनी निर्धनता से तंग आकर मरना चाहता है, एक साधु उससे कहते हैं, तुम्हारे पास तो लाखों रूपये हैं, यदि तुम अपनी एक आँख ही दे दो तो राजा तुम्हें एकम लाख रूपये दे देंगे. इसी तरह वह हर अंग की एक कीमत बताता है. निर्धन व्यक्ति किसी भी कीमत पर अपने अंग बेचना नहीं चाहता. उसे अपनी भूल का अहसास हो जाता है और वह किसी भी तरह मेहनत करके अपना जीवन यापन करने का प्रण लेता है. हम सभी अपने शरीर की अच्छी तरह देखभाल करते हैं, भरसक उसे उचित आहार, व्यायाम तथा विश्राम देकर स्वस्थ रखने का प्रयत्न करते हैं. इसके बावजूद हम रोगों के शिकार होते हैं, क्योंकि हम अपने भीतरी अंगों का उतना ध्यान नहीं रखते, वे दृष्टि से परे हैं सो हम जैसा चाहे उनके साथ व्यवहार करते हैं. जितनी बार हम क्रोध करते हैं, मस्तिष्क और हृदय पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है. अति ठंडा अथवा अति गर्म भोजन लेने पर दोनों ही स्थति में हमारा पेट प्रभावित होता है. आलस्य और प्रमाद का असर हड्डियों और मांसपेशियों को भुगतना पड़ता है. लोभ और ईर्ष्या का कुप्रभाव हमारी आँतों पर पड़ता है. न जाने कितने व्यर्थ के भय हम पाले रहते हैं, जिसका असर रक्त वाहिनियों पर पड़ता है. 

ईशावास्यमिदं सर्व जगत्यां जगत

२९ जून २०१७ 
उपनिषद कहते हैं, यह सारा जगत परमात्मा से आच्छादित है. जड़-चेतन सभी कुछ उसी का है, उसी से है. हमें त्याग भाव से इसका भोग करना चाहिए, जैसे हम किसी होटल अथवा किसी के घर जाते हैं तो सभी सामानों का उपयोग करते हैं, वहाँ दिया भोजन भी ग्रहण करते हैं पर किसी भी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं जताते. इस जगत में हमें वैसे ही मेहमान बनकर रहना है क्योंकि यह निश्चित है कि किसी भी क्षण इसे छोड़ना पड़ेगा. यदि आसक्ति वश हमने इसे अपना माना तो छोड़ते समय उतना ही दुःख होगा. त्याग भाव से भोगने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हम मांगे नहीं, देने वाले बनें. देने का भाव यदि भीतर बना रहता है तो जीवन में कभी भी किसी वस्तु का अभाव नहीं रहेगा. 

Wednesday, June 28, 2017

भाव बनें जब पावन अपने

२८ जून २०१७ 
हमारी पूजा और प्रार्थना मन के किस स्तर से आती हैं, साधक को इसका ध्यान रखना होगा. यदि पूजा से हम कुछ पाना चाहते हैं और प्रार्थना हम इसलिए करते हैं कि लोग हमें धार्मिक कहें, तो दोनों व्यर्थ हैं. पूजा को अहंकार बढ़ाने का नहीं उसे नष्ट करने का साधन बनाना है. जब तक मन पूर्ण संतोष व विश्राम का अनुभव नहीं कर लेगा उसे कुछ न कुछ बनने अथवा पाने का रोग लगा ही रहता है. ध्यान के बिना पूर्ण विश्राम सम्भव नहीं, अथवा तो मन जब श्रद्धा से ओतप्रोत हो जाये. भावशुद्ध हों तभी ध्यान घटता है. देह को पूर्ण शांत अवस्था में बैठाकर गहरी लम्बी श्वासें लेते हुए जब साधक स्वयं को परम के सम्मुख छोड़ देता है तब वही शांति और संतोष बनकर उसके मन व देह पर आच्छादित हो जाता है. 

Tuesday, June 27, 2017

भीतर एक विराट छिपा है

२७ जून २०१७ 
हमारा छोटा मन कभी भी संतुष्ट नहीं होता, उसे जितना मिले उस पर वह अपना अधिकार ही मानता है. कृतज्ञता की भावना उसमें नहीं होती. उसे प्रेम भी मिलता है तो वह उसे अपनी योग्यता मानता है अथवा तो उसके प्रति उदासीनता दिखाता है. जीवन में जितने भी दुःख अथवा कष्टों का अनुभव हमें होता है वह इसी छोटे मन के कारण. हमारे ही भीतर एक विराट मन भी है, जहाँ कोई अपूर्णता नहीं, जो सदा तृप्त है, जो सृष्टि की हर वस्तु के प्रति हर क्षण कृतज्ञ है. जिसे देह, मन, बुद्धि आदि भी ईश्वर का एक उपहार लगता है, जिसके माध्यम से वह जगत को देख, सुन सकता है. साधना के द्वारा हम छोटे मन से ऊपर उठकर विराट से जुड़ते हैं. हम देने के भाव से भर जाते हैं. उत्साह, सृजनात्मक शक्ति, उदारता, प्रेम, कृतज्ञता, अभय, सजगता और आनंद हमारे स्वभाव में झलकने लगते हैं.

Thursday, June 22, 2017

सहज मिले अविनाशी

२३ जून २०१७ 
हमारे मन की गहराई में एक अवस्था ऐसी भी है जहाँ किसी भी बाहरी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जो आदि काल से एकरस है और जो अनंत काल तक ऐसी ही रहेगी. सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है मन की वह अवस्था, जो जीवन का स्रोत है. विचार का भी स्रोत है. जब तक मन अपनी उस स्थिति से एक नहीं हो जाता, वह अभाव का अनुभव करता ही रहेगा. योग का उद्देश्य मानव को उसी स्थिति का अनुभव कराना है. उस अवस्था तक पहुँचने के लिए ही हम साधना के पथ पर कदम रखते हैं, और जो पहले वहाँ पहुंचा हुआ है वह गुरू ही हमें वहाँ तक ले जा सकता है. उसने वह मार्ग भली प्रकार देखा है, वह मन को भीतर-बाहर से अच्छी तरह समझ गया है. उसके निर्देशन में साधना करते हुए हम सहजता से अपने मूल तक पहुंच जाते हैं. गुरू के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति प्रेम हमारे मार्ग को रसमय व सुंदर बना देते हैं.

Wednesday, June 21, 2017

उसके आने के ढंग अजब

२२ जून २०१७ 
हमारा मन कभी वर्तमान में रहता नहीं और परमात्मा को अतीत या भविष्य में मिला नहीं जा सकता, सो कभी मिलन घटता ही नहीं. जैसे कोई किसी के पड़ोस में रहता है, पर जब वह काम पर जाता है, दूसरा सो रहा होता है और पहले के वापस आने तक उसकी शिफ्ट आरम्भ हो चुकी होती है, तो महीनों क्या वर्षों तक वे दोनों एक—दूसरे से नहीं मिल सकते. परमात्मा भी हमारा निकटतम है, पर क्यों कि जब वह मिल सकता है, हम वहाँ होते ही नहीं, जीवन बीत जाता है हम अजनबी ही बने रहते हैं. जब कोई किसी कार्य में तत्परता से लगा है, अतीत या भावी की कोई स्मृति या कल्पना तो दूर उसे यह भी ख्याल नहीं कि वह है, तब चुपके से परमात्मा आ जाता है और उसके काम में सहयोग करता है, तभी तो तल्लीनता में एक अपरिमित सुख का अनुभव होता है. 

योगी बनें उपयोगी बनें

२१ जून २०१७ 
हमारे अस्तित्त्व के कई स्तर हैं, कोई भी व्यक्ति अंतिम स्तर तक भी जा सकता है और केवल पहले पर ही रह कर पूरा जीवन बिता सकता है. देह के स्तर पर अन्य जीवों और मानवों में ज्यादा भेद नहीं है, मन के स्तर पर मानव मनन चिंतन कर सकता है जो अन्य प्राणी नहीं कर सकते. आत्मा के स्तर पर मनुष्य अपने भीतर आनंद और शांति के स्रोत से जुड़ सकता है. उसे पूर्ण स्वाधीनता और प्रसन्नता का अनुभव इसी स्तर पर होता है. योग ही इसका एकमात्र उपाय है. योग का अर्थ है जुड़ना, व्यष्टि का समष्टि से जुड़ना अथवा तो मन का आत्मा से जुड़ना. इसका आरम्भ देह से होता है, फिर श्वास की सहायता से मन की गहराई में जाकर व्यक्ति को जगत के साथ एकत्व का अनुभव होता है. योग को केवल कुछ आसनों तक ही सीमित कर देना ऐसा ही है जैसे शिक्षा का उपयोग मात्र जीविकापार्जन के लिए करना. 

Sunday, June 18, 2017

जिन खोजा तिन पाइयाँ

२० जून २०१७ 
जीवन वास्तव में एक खोज का ही नाम है. बाहर की हर खोज के माध्यम से वास्तव में मानव को अपनी ही खोज करनी है. यह सृष्टि कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता. यहाँ कुछ भी नया नहीं है, फिर भी सब कुछ हर पल नया सा जान पड़ता है. वास्तव में सब कुछ मानव पहले कितनी ही बार अनुभव कर चुका है, पर हर बार एक शिशु जब आँख खोलता है तो उसके लिए यह जगत कितने रहस्यों से भरा होता है. पहले परिवार फिर विद्यालय उसकी जिज्ञासाओं को शांत करता है, जिन्हें यह अवसर नहीं मिल पाता, वे बच्चे अविकसित ही रह जाते हैं, उन्हें अपने भीतर की सम्भावनाओं को खोजने का अवसर ही नहीं मिल पाता. हर किसी के भीतर एक न एक प्रतिभा छिपी है, जिसे अवसर की तलाश है, किन्तु उसका भान किसी–किसी को ही हो पाता है. हम स्वयं से ही अपरिचित रह जाते हैं, और यही पीड़ा विभिन्न रूपों में जीवन में कितनी बार नये-नये रूप लेकर आती है. 

Saturday, June 17, 2017

खोज मूल की होगी जब

१८ जून २०१७ 
हमारा मूल स्वभाव शांति, प्रेम और आनंद है, किसी को भी अशांत रहना पसंद नहीं, कोई उससे नफरत करे यह भी कोई नहीं सह सकता और दुःख से बचने की सहज ही हरेक के भीतर प्रवृत्ति होती है. नन्हा शिशु सहज ही प्रसन्न होता है, उसके प्रति अपने-पराये सभी का प्रेम उमड़ता है और छोटा सा दुःख आने पर वह रो-रोकर उससे छुटकारा पाने के लिए गुहार लगता है. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर अशांत होना सीख जाते हैं, प्रेम का अर्थ हर समय दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना मानने लगते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए वस्तुओं का आश्रय लेने लगते हैं. समय के साथ-साथ हमारा मूल स्वभाव कहीं नीचे दब जाता है, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति से ये चीजें मिल ही नहीं सकतीं, इसका ज्ञान जब तक होता है तब तक तो हम अपने स्वभाव को भूल ही चुके होते हैं. अब शांति, प्रेम, आनंद के लिए हम परमात्मा से गुहार लगाते हैं. जीवन में सत्य की खोज आरम्भ होती है. 

Friday, June 16, 2017

सुख-दुःख का कारण निज कर्म

१७ जून २०१७ 
सुबह से शाम तक हम जो भी कार्य करते हैं, उसका लक्ष्य एक ही होता है, हमारा व हमारे प्रियजनों का जीवन सुखमय हो. किन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हम कभी-कभी ऐसे कार्य कर देते हैं जो दुःख का कारण बनते हैं. इस दुःख से कैसे बचा जाये, शास्त्र व संत इसका मार्ग बताते हैं. किसी भी  कार्य को करने से पहले उसके फल का विचार कर लेना चाहिए. यदि वह कार्य दीर्घकाल तक दुःख देने वाला है और करते समय अल्प सुख देने वाला है तो उसे नहीं करना चाहिए. इसके विपरीत यदि वह कार्य अल्पकाल के लिए कठिन लगता है पर उसका फल दीर्घकाल तक सुख देता है तो उसे शीघ्र ही कर लेना चाहिए. उदाहरण के लिए योग साधना करने में आरम्भ में श्रम करना होता है पर उसके कारण जीवन में स्वास्थ्य व आनंद के जो पुष्प खिलते हैं उनकी तुलना में वह दुःख कुछ भी नहीं. देर रात तक जगना व सुबह देर से उठाना तात्कालिक रूप से सुख देता प्रतीत होता है पर देह में तमस व रोग का कारण बनता है.